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Friday, October 18, 2013

!! अपेक्षा !!

[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]
अपेक्षा! उपेक्षा!!
अपेक्षा परवरिश का दूसरा नाम है !
और उपेक्षा जीवन की मायूसी !
अपेक्षाओं के घर,
अंतर्मन के संवादों भरे
ईंट-गारों से बनते है।
अपेक्षाओं का सुखद स्पर्श हमारा मूल है।
अपेक्षाओं के स्वाद कड़वे होते है।
अपेक्षा और इच्छा के मध्य-
एक बारीक रेखा होती है !
अपेक्षा आश्रित होती है प्रायः!
इच्छा स्वयं द्वारा पोषित-
होती रहती है अकसर !
अपेक्षा रिश्तों की दीवारों के
मध्य में बसी होती है !
अपेक्षा खिन्नता की
चादर में लिपटी होती है !
अपेक्षा समाज को दो भागों में बांटती है !
अपेक्षा को अपनों से उपेक्षा का
दंश झेलना पड़ता है!
अपेक्षा की राह चल कर ही ,
उपेक्षा अपनी उपयोगिता सिद्ध करती है !
अपेक्षा के चार कदम से बेहतर है,
इच्छा के एक कदम चला जाय।
कई उपेक्षित पक्ष जब ,
एक अपेक्षा पर
खरा उतरना शुरू होता है तब,
मानवता का जन्म होता है !
गैर;उपेक्षित करने के
अपने धर्म के डोर से बंधे होते है।
ऐसे में, अपनो की अपेक्षा
समय के मरहम का काम करती है !
अपनो की उपेक्षा का घाव नासूर होता है !
अपनो की अपेक्षा की भूखी
प्रत्येक अपेक्षाएं
अपनों से मौन संवाद चाहती है !
अपेक्षाओं को बोलना नहीं आता!
सभी अपेक्षाएं मौन स्पर्श चाहती है!
अपेक्षा रिश्तों की पहली सीढ़ी है!
कई उपेक्षाओं से गिरने के बाद,
एक अपेक्षा की सीढ़ी मिलती है !
उपेक्षा नहीं,अपेक्षा के अवसर पर
है हम सभी___।[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]

Wednesday, March 13, 2013

मुट्ठी में रिश्ते


कनिष्ठा उंगली माँ की,
अनामिका पिता की,
मध्यमा भाई-बहन और
तर्जनी पत्नी की,
एक जुट हो कर मुट्ठी बनते है!
जिसे अंगूठे रूपी मित्र और
रिश्तेदार आवृत रखते है।
बंद मुट्ठी में 
संताने-बंधु-बांधव सहित पूरा परिवार
सुगठित और सुदृढ़ होता है।
 __पर,
एक भी उंगली खुली तो
मुट्ठी बिखर जाएगी और 
हथेलियों पर भाग्यरेखा की
डिस्पेंसरी खुल जाएगी!!
[13.03.2013/यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]
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Tuesday, March 12, 2013

रिश्तों की धूप-छाँव

चार स्तंभों को जोड़े छत
जिंदगी की ठाँव होती है!
स्तंभों के बिना
छत का वजूद क्या और
छत के बिना स्तंभों का
आशियाना क्या!
वक़्त की डाल पर
जिन्दगी ने लम्हों को
टांग दिया!
__और लम्हों ने
कब थामा जिन्दगी!
वक़्त की राहों पर,
है जिन्दगी मुसाफिर!
 …जीवन की यही धूप-छाँव है!
[12.03.2013/यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]
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Sunday, March 10, 2013

षोडश श्रृंगार और चौसठ कलाएं


सोलह श्रृंगार (षोडश श्रृंगार) की भारतीय साहित्य में प्राचीन परंपरा रही हैं!
01 - अंगों में उबटन लगाना,
02 - स्नान करना,
03 - स्वच्छ वस्त्र धारण करना,
04 - माँग भरना,
05 - महावर लगाना,
06 - बाल सँवारना,
07 - तिलक लगाना,
08 - ठोढी़ पर तिल बनाना,
09 - आभूषण धारण करना,
10 - मेंहदी रचाना,
11 - दाँतों में मिस्सी,
12 - आँखों में काजल लगाना,
13 - सुगांधित द्रव्यों का प्रयोग,
14 - पान खाना,
15 - माला पहनना,
16 - नीला कमल धारण करना।
भारतीय साहित्य में 64 कलाओं का वर्णन है, जो इस प्रकार हैं-
01 - गानविद्या
02 - वाद्य (भांति-भांतिके बाजे बजाना)
03 - नृत्य
04 - नाट्य
05 - चित्रकारी
06 - बेल-बूटे बनाना
07 - चावल और पुष्पादिसे पूजा के उपहार की
       रचना करना
08 - फूलों की सेज बनान
09 - दांत, वस्त्र और अंगों को रंगना
10 - मणियों की फर्श बनाना
11 - शय्मा-रचना
12 - जलको बांध देना
13 - विचित्र सििद्धयां दिखलाना
14 - हार-माला आदि बनाना
15 - कान और चोटी के फूलों के गहने बनाना
16 - कपड़े और गहने बनाना
17 - फूलों के आभूषणों से श्रृंगार करना
18 - कानों के पत्तों की रचना करना
19 - सुगंध वस्तुएं-इत्र, तैल आदि बनाना
20 - इंद्रजाल-जादूगरी
21 - चाहे जैसा वेष धारण कर लेना
22 - हाथ की फुतीकें काम
23 - तरह-तरह खाने की वस्तुएं बनाना
24 - तरह-तरह पीने के पदार्थ बनाना
25 - सूई का काम
26 - कठपुतली बनाना, नाचना
27 - पहली
28 - प्रतिमा आदि बनाना
29 - कूटनीति
30 - ग्रंथों के पढ़ाने की चातुरी
31 - नाटक आख्यायिका आदि की
       रचना करना
32 - समस्यापूर्ति करना
33 - पट्टी, बेंत, बाण आदि बनाना
34 - गलीचे, दरी आदि बनाना
35 - बढ़ई की कारीगरी
36 - गृह आदि बनाने की कारीगरी
37 - सोने, चांदी आदि धातु तथा हीरे-पन्ने
       आदि रत्नों की परीक्षा
38 - सोना-चांदी आदि बना लेना
39 - मणियों के रंग को पहचानना
40 - खानों की पहचान
41 - वृक्षों की चिकित्सा
42 - भेड़ा,मुर्गा,बटेर आदि को लड़ाने की रीति
43 - तोता-मैना आदि की बोलियां बोलना
44 - उच्चाटनकी विधि
45 - केशों की सफाई का कौशल
46 - मुट्ठी की चीज या मनकी बात बता देना
47 - म्लेच्छ-काव्यों का समझ लेना
48 - विभिन्न देशों की भाषा का ज्ञान
49 - शकुन-अपशकुन जानना,
       प्रश्नों उत्तर में शुभाशुभ बतलाना
50 - नाना प्रकार के मातृका यन्त्र बनाना
51 - रत्नों को नाना प्रकार के आकारों में काटना
52 - सांकेतिक भाषा बनाना
53 - मनमें कटकरचना करना
54 - नयी-नयी बातें निकालना
55 - छल से काम निकालना
56 - समस्त कोशों का ज्ञान
57 - समस्त छन्दों का ज्ञान
58 - वस्त्रों को छिपाने या बदलने की विद्या
59 - द्यू्त क्रीड़ा
60 - दूरके मनुष्य या वस्तुओं का आकर्षण
61 - बालकों के खेल
62 - मन्त्रविद्या
63 - विजय प्राप्त कराने वाली विद्या
64 - बेताल आदि को वश में रखने की विद्या
[10.03.2013/यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]
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Saturday, March 9, 2013

जिन्दा पत्थर


पत्थर
जो हमारी तरफ आये,
बटोर लिया और 
जिंदगी की इमारत में 
झोंक दिया!
मीलों लम्बी 
चलती राहों पर, 
समय की सुई जब रुकी,
रास्ते थम गए,
कारवां रुक गया!
मील का एक सुनहरा पत्थर,
जिंदगी की 
बारिशों में भींग कर,
रिश्तों की
धूप-छांव बन गया!
पत्थर भविष्य का
रास्ता रोक लेते है,
पत्थर अतीत का 
परिचय सहेजे रखते है,
पत्थरों पर आज का 
पता खुद गया!
पत्थर को धूल ढँक लेता है, 
पत्थर को पानी काट देता है,
पत्थर को हवाओं ने छिटका दिया!
[09.03.2013/यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]

Friday, March 8, 2013

नारी कोश


गंभीर; पानी के सतह की तरह!
उदार; नदियों के धार की तरह!
उर्वर; मिटटी के नमी की तरह!
निःस्वार्थ; पेड़ों के छाव की तरह!
उड़ान; जिंदगी की चिड़ियों की तरह!
विश्वास; तिनके की तरह!
कठिन; पहेली की तरह!
जटिल; लहरों की तरह!
आस; जिंदगी की तरह!
निरंतरता; धड़कनों की तरह!
उन्मुक्त; बारिशों की तरह!
इंसानियत; नारी की तरह!
नारी
एकदिनी
‘विश्व महिला दिवस’
नहीं
हर दिन का उजियारा,
हर रात का श्वेत अँधियारा है!
रिश्तों में जिन्दगी है नारी!

[08.03.2013/यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]
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Thursday, March 7, 2013

रिश्तों की गाँठ









पल-पल
जिन अरमानों को बोया,
एक भी
अंकुर नहीं फूट रहे!
रिश्तों की
अनसुलझी गांठों पर,
कितने रिश्ते टूट रहे!
हम सहेज रहे 
जीवन सारा,
तुम उधेड़-उधेड़ कर 
बिखेर रहे!
मै सुबह की चाल तयं करता,
तुम साँझ की चादर झोंक रहे!
हम जीत गए दुनिया सारी,
अब आज स्वयं ही हार रहे।
पहले ही कहा होता हमसे,
नहि तुमपर 
दाँव लगाये होते!
07.03.2013_[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]
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